मंगलवार, 8 जनवरी 2013

क्या बलात्कारियों को सही सजा मिल पायेगी ?

              क्या बलात्कारियों को सही सजा मिल पायेगी ?


आखिरकार मौत से दो-दो हाथ करने वाली को मौत ने अपने आगोश में समेट ही लिया | ना जाने कौन सा वो दुष्ट प्राणी होगा जिसने पहली बार बलात्कार जैसा घ्रणित अपराध किया होगा | आखिर क्यों ये अपराध होता है ? चीखती हुई एक लड़की की आवाजें क्या ये जघन्य अपराध करने वालों के कानों को नहीं भेदती ? कैसे वे लोग किसी की दर्द भरी चीखों और छटपटाते बदन को अपना आनंद मान लेते हैं ? क्या कुछ इंसान बिना दिल के भी होते हैं ?

मेरा देश तो विवेकानंद का देश था जिन्होनें युवाओं से कहा था-" उठो,जागो और अपने अंदर निहित देवव्त्व को व्यक्त करो । " पर ये क्या यहाँ तो कुछ युवाओं ने शराब पीकर अपने अंदर के दानव को जगा दिया ।

उस लड़की के साथ दरिंदगी हुई और १३ दिन तक असहनीय पीड़ा सहकर उसकी आत्मा आज उसका शरीर छोड़ गयी । ये सब हुआ मात्र १३ दिन में और इस कुकृत्य को करने वालों को १३ महीने में भी सजा हो जाये तो बहुत है । क्योंकि अपराध होते हैं चीते की गति से और न्याय होता है चींटी की गति से ।

बलात्कार पर हमारा कानून उस युग का बना हुआ है जबकि ऐसे बलात्कार के मामले रोज़-रोज़ नहीं होते थे । अब तो ऐसे मामले बहुतायत से होते हैं । कई बलात्कारी तो बच के आसानी से निकल भी जाते हैं । आज की आधुनिक भाषा में कहें तो बलात्कारी तो अपडेट हो गए हैं पर हमारा कानून नहीं । टी0वी0 और इण्टरनेट अपनी शैशवावस्था में थे तब बना था ये कानून । अब तो खैर ये आवश्यकता से अधिक प्रचलित हो गये हैं । साथ ही इनमें अश्लील सामग्री का भण्डार भी है । सेंसर बोर्ड नाम की है तो एक चीज पर अधनंगे बदन और अश्लील संवाद वाले दृश्य फिर भी अव्यस्कों के लिए पास हो जाते हैं । आखिरकार बदन दिखाने पर और फूहड़ता परोसने पर अच्छी कमाई जो होती है । इनका किशोरों पर क्या प्रभाव पड़ता है , इस पर कितने लोग सोचते हैं ? इण्टरनेट की दुनिया में तो अश्लील सामग्री खैर बहुत ही आसानी से उपलब्ध है । इस पर कानून बना तो इन साईटों के खुलने से पहले एक चेतावनी आने लगी कि यदि आप १८+ ना हों तो इसे ना खोले । बस इनका उत्तरदायित्तव समाप्त , फिर चाहें ऐसी साईटों को १० साल का ही कोई बच्चा ना खोल ले । अरे क्लिक करने पर ये कहाँ पता चलता है कि क्लिक करने वाला कितने साल का है ? परिणाम ये होता है कि किशोर कब गलत रास्ते पर भटक जाते हैं , उन्हें स्वयं ही पता नहीं चलता ।

एक ओर ये जघन्य कांड हुआ और दूसरी ओर पूरे देश में बलात्कार की खबरें आती रहीं । यूँ तो ऐसी घटनायें रोज़ होती रहती हैं पर ये घटना मीडिया में कुछ ऐसी उछली कि सब ही की संवेदनायें जुड़ती चली गईं । कुछ विद्यालयों में इस पर वाद-विवाद प्रतियोगिता भी हुई । दिल्ली की देखा-देखी कई जगहों पर मोमबत्ती मार्च भी निकला । कुछ तो वास्तव में संवेदनशील थे बाकी ये सोच कर इनकी नकल कर रहे थे कि कहीं कोई हमें कम आधुनिक ना कह दे । मीडिया ने भी सोचा कि ये मुद्दा बिक रहा है तो उसने भी इस घटना को कई घंटे दिए । जो बिकता है वही तो चलता है ।

पर क्या आप लोग मानते हैं कि इस घटना से सूदूर गाँव में रह रहे युवाओं को कोई फर्क पड़ा ? सच तो ये है कि दूर-दराज में रहने वाले लोगों जहाँ आज भी विकास नहीं हुआ है वहाँ के लोगों को तो इस घटना का पता भी नहीं होगा क्योंकि वे लोग तो मेहनत-मजदूरी करके अपना पेट भरने में लगे हैं । इस घटना के बाद ऐसे लोग अपने बेटे-बेटियों को इस घटना से कोई सबक भी ना दे पाए होंगे । उन्हें इस घटना के बारे में बताएं तो भी कहते हैं- “अरे तो हम का करें हमन ने थोड़े ही कुछ करो है । “

चलिए अब आते हैं थोड़े विकसित क्षेत्र की ओर यहाँ कुछ थोड़े पढ़े-लिखे लोग जब ये घटना अखबारों में पढ़ते हैं तो कुछ ऐसी प्रतिक्रिया होती है-“ अरे दईय्या एक छोरी पर ऐते लोग पिल पड़े वा की तो हालते खराब हो गई होगी ।“

ये लोग कोई कैण्डिल मार्च नहीं निकालते ना ही किसी आंदोलन से जुड़ पाते हैं पर संवेदना अवश्य प्रकट कर देते हैं । अब आते हैं हम और आप । हम कैण्डिल मार्च भी निकालते हैं सोशल साईट पर भी लिखते हैं आन्दोलन में भी खड़े होते हैं । जानते हैं सोच में ये अंतर क्यों , वो इसलिए क्योंकि शिक्षा में बहुत अंतर है । आर्थिक स्तर में भी ।

हालाँकि कई लोग ऐसी खबरों में भी आनंद लेते हैं । पर मेरा मानना है कि कहीं ना कहीं अशिक्षित व्यक्ति ही ऐसे कुकृत्यों में अधिक संलिप्त रहते हैं । पढ़े-लिखे तो यौन शोषण करते हैं और आवाज को पैसों से दबा देते हैं , वे बलात्कार नहीं करते हैं । उच्च वर्ग के लोग जब ऐसा कोई कुकृत्य करते हैं तो रिपोर्ट ही नहीं लिखी जाती ।

सरकार वृद्धाश्रम बनाती है वृद्धों के लिए , महिलाओं और बच्चों के लिए भी कई योजनायें चलाती है । युवाओं के लिए भी कई योजनाएं चलाती है- जैसे बेरोजगारों के लिए ऋण, छात्रवृत्ति और अब तो ये भी कहा जा रहा है कि हर गाँव में एक खेल का मैदान होगा । चलिए बहुत अच्छी बात है । युवाओं को 2 चीजों की बहुत आवश्यकता होती है – नौकरी और छोकरी की । नौकरी की तो एक बार को आसानी से व्यवस्था हो जाती है – चाहे कोई अपने पैतृक व्यवसाय में लग जाता है या कहीं मजदूरी ढूंढ लेता है, ट्यूशन तो पढ़ा ही लेता है । किशोरावस्था से ही आर्थिक रूप से सबल होने का प्रयास करने लगता है । पर तस्वीर का दूसरा पहलू भी है । किशोर हार्मोंस का एक तूफान होता है । उसके शरीर में एकदम से ढेर सारे परिवर्तन हो रहे होते हैं , बस इसी के प्रबंधन की कोई व्यवस्था नहीं है । माँ – बाप इस संबंध में कोई शिक्षा दे नहीं पाते । इसकी अधकचरी शिक्षा मिलती है उन्हें अपने साथियों या फिर अपने से थोड़े बड़े किशोरों/युवाओं से । इसका परिणाम कुछ भी हो सकता है किशोर गलत कदम भी उठा सकते हैं क्योंकि हार्मोंस के तूफान का सही प्रबंधन नहीं हो पाया । क्या सरकार को इस संबंध में कुछ नहीं करना चाहिए ? ये सत्य है कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में सीधे-सीधे यौन शिक्षा संभव नहीं है पर सही आचरण की शिक्षा तो दी जा सकती है ना । कुछ ऐसे योगासन भी हैं जो कि ऐसी ही मनोवृत्ति को रोकने में सहायक हैं, उनकी तो शिक्षा दी जा सकती है ना । पर नहीं , देंगे तो सीधे यौन शिक्षा नहीं तो कुछ नहीं । हा....ह क्या अप्रयोगात्मक सोच है ।

शिक्षा और कानून एक साथ मिलकर क्या कर सकते हैं अगर जानना हो तो इतिहास उठाकर राजा राममोहन राय के बारे में पढ़िए ।

देखिए , आजकल नैतिक शिक्षा कितनी पिछड़ गई है ? एक उदाहरण देंखे - एक लिपिक की परीक्षा में प्रश्न होते हैं अंग्रेजी के, गणित के,अर्थशास्त्र के पर क्या उसकी नैतिकता या आचरण से कोई प्रश्न होता है ? नहीं ( अगर आने लगे ऐसे प्रश्न तो उसके लिए भी किताबें आ जायेंगी ) क्यों क्या एक लिपिक को केवल विभागीय ही ज्ञान होना चाहिए बाकी उसके आचरण से कोई मतलब नहीं ।


यह तो ठीक है कि हम सब क्रुद्ध हैं उन आरोपियों पर जिन्होनें ये कांड किया । पर वो कैसे इस परिस्थिति में पहुँचे क्या ये जानना जरूरी नहीं ? क्या सरकार और पुलिस का ये कर्त्तव्य नहीं बनता कि वो ऐसे अपराधियों से पूछे कि ऐसा जघन्य अपराध करने का विचार उन्हें कैसे आया ? वास्तव में उनसे इसकी पूछताझ करके क्या इसे सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए व इससे सीखकर ऐसी मनोवृत्ति को पनपने से रोकने का हर प्रयास क्या नहीं किया जाना चाहिए ?

आज नहीं तो कल इन लोगों को सजा तो मिल ही जायेगी पर उससे क्या होगा ? उन्हें सजा क्या मिलेगी संभवतया फाँसी । इससे क्या होगा , हमारा और आपका आक्रोश संभवतया शांत हो जाये । अगर 7 साल की कैद मिलती है तो क्या होगा ? ये अपराधी 7 सालों तक कारागार में रहेंगे , ये लोग पत्थर तोड़ेगे और नियमित रूप से खाना खायेंगे अपने से बड़े अपराधियों से मिलेंगे जो संभवतया इनसे ये भी कहें –“ अरे एक ही में अंदर आ गया , 2-4 तो कर लेता ।“

क्या दोनों ही परिस्थितियों में इन्हें अपराध बोध हुआ ? मुझे तो नहीं लगता । क्यों ना ऐसा किया जाए कि इन लोगों को सजा कि अवधि में प्रतिदिन एक घंटे ये लिखने को दिया जाए कि हम शर्मिंदा हैं । ये अपराध घ्रणित था आदि-आदि । जब तक रोज़ इन्हें ये एहसास नहीं कराया जाएगा । तब तक कैसे इसे सजा कह सकते हैं । अरे पत्थर तोड़ना, चक्की चलाना , बढ़ईगिरि , कपड़ा बनाना ये सारे काम तो एक मजदूर भी करता है । भले ही उसे 2 वक्त की रोटी नसीब ना हो पाए । पर कारागार में तो रोटी भी पक्की है । सजा तो वो है जब कि पल-पल एह्सास हो उन्हें अपने अपराध का । उस लड़की की दर्द भरी चीखें जब रोज़ सुनाईं जायें , हर पल उन्हें अपने कुकृत्य पर जब तक शर्म ना आने लगे तब तक सजा क्या खाक सजा है ?

सामूहिक बलात्कार की घटनायें यूँ तो रोज़ ही होती हैं, कई की तो रिपोर्ट भी नहीं लिखी जाती । पर ये घटना कुछ ऐसे सामने आयी कि हर शख्स इससे अपनेपन की भावना के साथ जुड़ता चला गया । आशा है कि इस घटना के बाद सरकार कानून में परिवर्तन लाए ना लाए पर समाज में परिवर्तन अवश्य आएगा ।
जानते हैं क्या ........................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................... कन्या भ्रूण हत्या संभवतया बढ़ जायें ।

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

विद्यार्थी भी सिखाते हैं ।



मित्रों ,
           
           शिक्षक वही जो केवल सिखाये नहीं सीखे भी । हमने भी बी0एड0 किया है , यानि शिक्षक को कैसे पढ़ाना चाहिये इसका १ वर्षीय प्रशिक्षण पाया है । जाने कितनी शिक्षण विधियों और युक्तियों को साल भर पढ़-पढ़कर , समझकर , अपनाकर , प्रयोग करकर और रटकर उत्तीर्ण हुए थे । पर एक दिन कक्षा-५ की एक छात्रा ने इन समस्त युक्तियों से अलग एक युक्ति हमें समझा दी । हाँलाकि बहुत व्यापक तो नहीं है , पर है प्रभावशाली ।

           दरअसल हुआ कुछ ऐसा कि हमारे विद्यालय में कक्षा-५ की एक होनहार छात्रा ने आकर हमसे कहा कि सर हमने १३ तक के पहाड़े याद कर लिये हैं । आप हमारी कॉपी पर १४ और १५ के पहाड़े लिख दीजिये , ताकि हम याद कर सकें । मैंने कहा कि बहुत अच्छा लाओ कॉपी । फिर उसने हमें अपनी गणित की कॉपी थमा दी और हमने उसके बायें पृष्ठ पर १४ का और दायें पृष्ठ पर १५ का पहाड़ा लिख दिया । फिर वो छात्रा जाकर अपने स्थान पर बैठ गयी और उन पहाड़ों की आगे नकल ना करके पहले याद करने बैठ गयी और मैं अपने रजिस्टर कार्य में व्यस्त हो गया । लगभग आधे घंटे बाद में वो मेरे पास आई अपनी कॉपी लेकर और मैंने देखा कि वह बायें पृष्ठ पर १४ के पहाड़े के आगे एक-एक खड़ा खाना छोड़कर १५ का पहाड़ा लिखकर ले आई और दायें पृष्ठ पर १५ के पहाड़े के आगे एक-एक खड़ा खाना छोड़कर १४ का पहाड़ा लिखकर ले आई । ये देखकर मैंने समझा कि ये तो गड़बड़ कर दी इसने । मैंने उससे पूछा कि १४ के पहाड़े के आगे १५ का पहाड़ा और १५ के पहाड़े के आगे १४ का पहाड़ा लिखकर क्यों लाई हो । तब उसने मुझसे कहा कि सर जी पहले मैंने १४ और १५ के पहाड़े याद कर लिये और बाद में १४ के पहाड़े के आगे १५ का पहाड़ा और १५ के पहाड़े के आगे १४ का याद करा हुआ पहाड़ा लिखा ताकि मैं कोई न नकल ना करूँ । वैसे आप पहले जब भी पहाड़ा लिख कर देते थे और मैं याद करके लिखती थी तो मेरी नजर उधर चली जाती थी और मैं पहाड़ा याद होते हुए भी उसकी नकल करने लगती थी । इसीलिए मैंने अबकि बार १४ के पहाड़े के आगे १५ का पहाड़ा और १५ के पहाड़े के आगे १४ का पहाड़ा याद करके लिखा ताकि नकल ना करूँ ।
          
            मैं ये देखकर हतप्रभ रह गया कि १० वर्षीय एक छात्रा में कैसे ईमानदारी , कुछ नया करने की ललक और पढ़ाई के प्रति समर्पण था । मैंने उस लड़की को मन ही मन बहुत आशीर्वाद दिया और कहा कि बहुत बढ़िया ।
         
           अब तब से मैं ये युक्ति कई छात्रों पर प्रयोग कर चुका हूँ । इससे दो लाभ होते हैं । एक तो ये कि छात्र पहले पहाड़े याद करते हैं और फिर लिखते हैं जिससे एक प्रकार से वो स्वयं की ही तनावरहित परीक्षा ले लेते हैं और दूसरी ओर उन्हें पढ़ने की एक नयी युक्ति मिल जाती है । मेरे जो मित्र ग्रामीण परिवेश के छात्रों को पढ़ाते हैं , वो जानते हैं कि इन छात्रों को नये – नये तरीकों से पढ़ना कितना अच्छा लगता है । 

          अपनी छात्रा से सीखी गई इस युक्ति को मैं जीवन भर याद रखूँगा ।

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

शांति कबूतर की पीड़ा

         

                   शांति  कबूतर  की  पीड़ा

मित्रों ,
 आज मैं जब अपने घर की  छत पर गया तो मैंने देखा कि एक कबूतर छत की  पिछली दीवार पर बैठा हुआ था । शांत – सा , थका हुआ सा , एकदम सुस्त सा ।  मैंने उसे देखा तो सोचा  कि उससे पूँछू कि क्यों वो ऐसी दुर्दशा वाली स्थिति में है । अपने आपको एक तारणहार समझकर मैं उसके पास गया और बोला – “नमस्ते कबूतर जी ! कैसे हैं आप ?”
कबूतर ने फिर भी उदासी ही दिखाई । वैसे ही सुस्त – सा पड़ा रहा । मैंने पुन : अपना प्रश्न दोहराया । अबकि बार तीव्र स्वर में । तो वो कुछ खिसियाते हुए सा बोला – “ अबे ठलुए मास्टर ! तुझे अब कोई काम नहीं रह गया क्या ? वैसे तो तेरे रोज - रोज के नाटक रहते हैं कि मुझे समय नहीं मिलता ईंचार्ज हूँ , बी0एल0ओ0 भी हूँ । अब काहे मेरा आराम और अपना समय खोटी करता है वीड़ू ?”
कबूतर की महान वाणी सुनकर हम इस सोच में पड़ गये कि बताओ जी ! क्या हालत हो गयी है हम मास्टरों की अब कबूतर भी हमारा दर्द तो जानते हैं , पर साथ ही हड़काते भी हैं , जैसे कि हमारे अ............
खैर धीरे – धीरे हमने स्वयं को संभाला और पुन : अपने जिज्ञासु चरित्र पर उतर आये । हमने अपने  बी0 एड0 के प्रशिक्षण की कुछ युक्तियों का स्मरण किया तथा उन कबूतर जी पर दूसरे शब्दों में अपना प्रश्न उछाला । अबकि हमारे शब्दों के योग से बना वाक्य कुछ ऐसा था – “सफेद वाले कबूतर जी आप यहाँ कब तक बैठेंगे ?”
अब कबूतर जी और अधिक चिंतित परंतु सक्रिय अवस्था में आ गये । बोले – “तुम क्या ये चाहते हो कि मैं अभी चला जाऊँ ?
हम तुरंत ही बचाव की अवस्था में आ गये और तपाक से उत्तर दिया –“ नहीं बंधु अइसा नहीं है । हम तो सिर्फ इतना ही  जानना चाहते हैं कि आपकी आज ऐसी दशा क्यों है ये कृप्या हमसे साझा करें । “
(बातों – बातों में हम कबूतर जी को बंधु भी कह चुके थे । )
कबूतर जी अब कुछ मैत्रीवत व्यवहार की अवस्था में आ गये थे । वैसे भी अगर ना आते तो हमारी छत पर कैसे बैठे रह पाते ?  वे बोले – “ अरे क्या बताऊं यार ! अब तो लोगों ने जीना हराम कर रखा है । हमें किसी इंसान ने कभी किसी युग में शांति का प्रतीक घोषित किया था । युद्ध के बाद अगर दोनों पक्षों में संधि हो जाती थी तब भी हमें उड़ाया जाता है ।
 उस समय हमारी प्रजाति के लोग बड़े प्रसन्न हुए थे कि इतने सारे पक्षियों में हमें ही ये सम्मान मिला । पर आज हम लोग बहुत दु:खी हैं । पहले ऐसी घटना साल में १-२ बार ही होती थीं पर अब वैश्वीकरण का दौर है । सब लोग जान गये हैं कि युद्ध के बाद शांति कबूतर उड़ाना है । अब तो गली-मोहल्ले में भी छोटी - मोटी लड़ाई के बाद सफेद कबूतर उड़ाने लगे हैं । “
कबूतर जी बहुत ही गम्भीर मुद्रा में ये सब बखान कर रहे थे । पर हमने उन्हें बीच में टोक दिया – “ भैय्या तो इसमें तो अच्छी बात है । आपकी पूछ ही बढ़ रही है । इसमें परेशान होने की क्या बात है ?
कबूतर जी खिसियाते हुए बोले – “ पहले तो बीच में ही टोक रहे हो और फिर कह रहे हो कि परेशान क्यों हूँ मैं । अरे बताने तो दो ।“
कबूतर जी ने हमें घूरने की अवस्था में कहा । हम तो अब कुछ भी कहने की अवस्था में नहीं थे तो चुपचाप रहकर ही आँखों से ही कह दिया कि ठीक है । आप आगे कहें । परंतु वो चुप ही रहे और बोले ‌- “ अरे अब आगे की बात नहीं सुननी है क्या ?
ये सुनकर हम थोड़ा सा सकपकाये । हम बोले – “ अरे भाई हमने आँखों से हाँ कहा तो था । “
कबूतर जी ने ये सुनकर हमें आड़े हाथों लिया । बोले – “ अरे मास्टर साहब आपने फैशन में फोटोक्रोमिक शीशों वाली ऐनक लगा रखी है । किसी को आपके आँखें दिखाई ही कहाँ दे रही हैं ? हाँ नहीं तो । “
हमने फिर अपनी ऐनक उतारकर उन्हें आँखों से संकेत दिया कि आगे बोलें ।
वे बोले – “देखो भाई ऐसा है कि एक तो हर पक्षी की भाँति हमारी संख्या भी घट रही है पर युद्धों की संख्या बढ़ती जा रही है । अब इससे होता ये है कि हम लोग खुले आकाश में उड़ ही नहीं पा रहे हैं । लोग जैसे ही हमें देखते हैं तुरंत पकड़ने की कोशिश करने लगते हैं ताकि युद्ध के बाद या दो देशों की सीमा पर हमें उड़ा सकें । जानते हो हमें पकड़ने के बाद लोग खाने को कुछ भी नहीं देते ताकि हमें उनसे कोई प्रेम ना हो जाये और जैसे ही वो हमें उड़ाने की कोशिश करें । हम मिसाइल की गति से उड़ जायें । क्योंकि अगर ना उड़े तो उनका सार्वजनिक रूप से अपमान हो जायेगा ।
  जानते हो आजकल लोग युद्ध केवल मुँह से ही समाप्त करते हैं , हृदय से नहीं । सामने वाले के प्रति लोग दुर्भावना ही रखते हैं । इसीलिए जब हमें छोड़ना होता है और हमें छोड़ने वाले लोग हमें हाथ में पकड़ते हैं तो वह गुस्सा हम पर ही निकालते हैं । हमें इतनी निर्दयता से पकड़ते हैं जैसे कि अपने शत्रु की गर्दन पकड़े हों । क्रोध किसी और पर होता है और झेलना हमें पड़ता है । पर फिर भी हम शांति कबूतर बुरा नहीं मानते हैं । हमें बुरा तब लगता है जब हमें शांति के प्रतीक के रूप में उड़ाने वाले लोग अपने हर वादे को भूलकर फिर २-४ महीने में ही लड़ने लगते हैं । फिर जब वो लड़ते – लड़ते थक जाते हैं तो फिर हमें कहीं से पकड़कर ले आते हैं और फिर उड़ा देते हैं ।
सच कहूँ तो एक बात मेरी आज तक समझ में नहीं आई कि जब लोग हमें शांति का प्रतीक कहते हैं तो फिर हमें उड़ाकर क्या साबित करते हैं कहीं ये तो नहीं कि वे अपने मन से भी शांति को उड़ा रहे हैं । खैर फिर भी हम इसी आशा में रहते हैं कि कभी तो ऐसा दिन आयेगा कि लोगों को हमारी आवश्यकता ना पड़े । विश्व में चारों ओर शांति ही शांति हो । “
ये कहकर वो सफेद वाले कबूतर जी अपने पंखों को फड़फड़ाने लगे । हम ने तुरंत ही एक प्रश्न ठोंका – “ कहाँ जा रहे हो बंधु ?”
वो बोले – “ जा रहे हैं भाई फिर से उड़ने की कोशिश करेंगे भले ही कोई हमें फिर से पकड़ ले । आखिर हम हैं तो शांति के प्रतीक ही जैसे तुम मास्टर लोगों की छवि लोगों ने खराब कर रखी है । पर तुम अपना कर्त्तव्य नहीं छोड़ते हो । वैसा ही हम भी करते हैं भाई । आशा की किरण हरदम साथ रहती है – मास्साब जी “
ये कहकर कबूतर जी खुले आकाश में उड़ गये और हम उन्हें अपनी खुली आँखों से उड़ते हुए देख रहे थे । हम अपने को बड़ा महान मास्टर मानते थे-पूरे विश्व को सीख देने वाले पर आज कबूतर जी हमें सीख दे गए थे कि चाहें कितनी भी बुरी स्थिति क्यों ना हो जाये , कभी भी आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिये और हम उनकी दी गई इस अमूल्य शिक्षा पर उन्हें धन्यवाद भी देना भूल गए थे ।
आप लोगों को अगर वो कबूतर जी मिलें तो हमारी ओर से उन्हें धन्यवाद  अवश्य बोल दीजियेगा ।
  

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

जोरु का गुलाम

                                  बचपन में ही सिखा दिया 

 

फोटू देखा ?

कुछ स्मरण आया ।

ये हम सबके बचपन की प्रिय कहानी है मित्रों  "बंदर और मगरमच्छ"  की । अगर आपको स्मरण हो तो ये कहानी कुछ ऐसी थी कि मगरमच्छ घूमने का आदि था । सो एक दिन घूमते-घूमते वो पहुँच गया नदी के किनारे वहाँ उसकी मित्रता हो गयी एक बंदर से । जब मगरमच्छ ने बंदर से ले जाकर मीठे बेर अपनी पत्नी को खिलाये तो उसने कहा कि उसे अब बंदर का मीठा कलेजा खाना है । पहले तो मगरमच्छ  ने अपने आदर्शों का हवाला देकर कहा कि मैं ऐसा नहीं करूँगा।  पर बाद में मगरमच्छ की पत्नी ने हड़काया तो वो एक अच्छा ज़ोरु का गुलाम बनकर बंदर का कलेजा लेने निकल पड़ा ।

इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है - यही ना कि मगरमच्छ ज़ोरु का इतना बड़ा गुलाम था कि अपने मित्र की ही जान का दुश्मन बन गया ।  अब बच्चों को जब बचपन में ही ऐसी कहानी पढ़ा दी जायेगी तो बच्चे आगे चलकर क्या बनेंगे जी.......................................................................................................................................................................................
 सब के सब जोरु के गुलाम ना बन जायेंगे ? हाय रे ! बेचारे बच्चे ।

कहाँ गयी आरम्भ की सीढ़ियाँ

मित्रों,
मैं जिस दिन विद्यालय जाता हूँ , उस दिन बरेली से मिलक की यात्रा करता हूँ ।  मार्ग में एक स्थान पड‌ता है - फतेहगंज वहाँ का एक रूचिकर चित्र यहाँ चिपका रहा हूँ । आप लोग इस चित्र को देखेंगे तो पायेंगे कि इसमें सीढियाँ समाप्त तो हो रही हैं ,परंतु आरंभ..................
आप लोग इस चित्र को देखकर एक शीर्षक दीजिये ।

शीर्षक देते स्मरण रखियेगा कि शीर्षक कच्ची पोई वाला होना चाहिये (अर्थात् हँसोड़) । 

 

गुरुवार, 15 नवंबर 2012

चित्रगुप्त जी की जय

मित्रों ,

आजकल हर मॉल , बैंक और कई विध्यालयों में भी लिखा रहता है कि आप गुप्त कैमरों की नजर में हैं ।

ये पढ़कर अक्सर हम सतर्कता से व्यवहार करने लगते हैं । चाहे हमारा कुछ गलत करने का विचार ना भी हो तो भी हमारे व्यवहार में कुछ अस्थाई परिष्करण अवश्य हो जाता है और गुप्त कैमरों की सीमा से बाहर आते ही हम राहत की सांस लेते हैं और फिर चिंता कम हो जाती है ।

पर वास्तव में जब हमें लगने लगता है कि हम गुप्त चित्रों खींचने वाले कैमरे की सीमा से बाहर आ गये हैं । तब भी हम पर हर पल एक दृष्टि रखी रहती है - चित्रगुप्त द्वारा । हम जो भी करते हैं उसके तकनीकी गुप्त चित्र भले ही ना खिंच पायें पर चित्रगुप्त जी के पास पूरा लेखा-जोखा रहता है , इसलीये मेरा मानना है कि आज चित्रगुप्त जयंती के दिन इस बात पर मनन करना चाहिये कि गुप्त चित्रों के सम्राट चित्रगुप्त जी के पास पूरा लेखा-जोखा है तो फिर हर समय यही मानते रहें कि हम गुप्त कैमरों की नजर में हैं और कुछ भी गलत करने से डरें ।

तो बोलिये चित्रगुप्त जी की जय !




बुधवार, 14 नवंबर 2012

एग्जामनर का अर्थ ( कुछ संदर्भों में )

मित्रों ,

अण्डा (एग) अपने बेसिक शिक्षा विभाग का बड़ा ही जाना-पहचाना और प्रतिदिन प्रयोग में आने वाला शब्द है। मेरे जीवन में तो इसका अत्यंत ही योगदान रहा है ।


आगे बढ़ने से पहले एक बात स्पष्ट कर दूँ कि अण्डे (एग) का अर्थ  0 (शून्य) से है ना कि किसी पक्षी के अण्डे (एग) से ।

हाँ तो मैं अण्डे(एग) के योगदान के बारे में कह रहा था । जब हम कक्षा में मास्टर जी के किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाते थे तो मास्टर जी कहते थे कि क्या आता है तुम्हें अण्डा (एग) या फिर मास्टर जी कहते थे अगर ठीक से पढ़ोगे-लिखोगे नहीं तो एग्जाम में अण्डा (एग) मिलेगा । मेरा तो बचपन में प्रतिदिन ही ऐसे वाक्यों से सामना होता था । क्या करूँ मेरी कच्ची पोई है ना ।

कुछ दिन पहले मेरे एक मित्र ने मुझसे पूछा कि कुछ छात्र साल भर बहुत मेहनत से पढ़ते हैं ,पर फिर भी एग्जाम में उनके कम नंबर आते हैं ऐसा क्यूँ ?

कठिन प्रश्न सुनकर पहले तो मैं भी सोच में पढ़ गया पर तभी मैंने अपने कच्ची पोई वाले दिमाग का प्रयोग किया और उन मित्र को समझाया कि

'एग्जामनर' का अर्थ होता है ऐसा 'नर' जो 'जाम' लगाकर छात्रों को 'एग' (यानि अण्डा) अर्थात‌‌ शून्य देता है ।

क्या आपको भी लगता है कि सभी नहीं परन्तु कुछ 'एग्जामनर' के बारे में ये सही है ?