शनिवार, 15 दिसंबर 2012

विद्यार्थी भी सिखाते हैं ।



मित्रों ,
           
           शिक्षक वही जो केवल सिखाये नहीं सीखे भी । हमने भी बी0एड0 किया है , यानि शिक्षक को कैसे पढ़ाना चाहिये इसका १ वर्षीय प्रशिक्षण पाया है । जाने कितनी शिक्षण विधियों और युक्तियों को साल भर पढ़-पढ़कर , समझकर , अपनाकर , प्रयोग करकर और रटकर उत्तीर्ण हुए थे । पर एक दिन कक्षा-५ की एक छात्रा ने इन समस्त युक्तियों से अलग एक युक्ति हमें समझा दी । हाँलाकि बहुत व्यापक तो नहीं है , पर है प्रभावशाली ।

           दरअसल हुआ कुछ ऐसा कि हमारे विद्यालय में कक्षा-५ की एक होनहार छात्रा ने आकर हमसे कहा कि सर हमने १३ तक के पहाड़े याद कर लिये हैं । आप हमारी कॉपी पर १४ और १५ के पहाड़े लिख दीजिये , ताकि हम याद कर सकें । मैंने कहा कि बहुत अच्छा लाओ कॉपी । फिर उसने हमें अपनी गणित की कॉपी थमा दी और हमने उसके बायें पृष्ठ पर १४ का और दायें पृष्ठ पर १५ का पहाड़ा लिख दिया । फिर वो छात्रा जाकर अपने स्थान पर बैठ गयी और उन पहाड़ों की आगे नकल ना करके पहले याद करने बैठ गयी और मैं अपने रजिस्टर कार्य में व्यस्त हो गया । लगभग आधे घंटे बाद में वो मेरे पास आई अपनी कॉपी लेकर और मैंने देखा कि वह बायें पृष्ठ पर १४ के पहाड़े के आगे एक-एक खड़ा खाना छोड़कर १५ का पहाड़ा लिखकर ले आई और दायें पृष्ठ पर १५ के पहाड़े के आगे एक-एक खड़ा खाना छोड़कर १४ का पहाड़ा लिखकर ले आई । ये देखकर मैंने समझा कि ये तो गड़बड़ कर दी इसने । मैंने उससे पूछा कि १४ के पहाड़े के आगे १५ का पहाड़ा और १५ के पहाड़े के आगे १४ का पहाड़ा लिखकर क्यों लाई हो । तब उसने मुझसे कहा कि सर जी पहले मैंने १४ और १५ के पहाड़े याद कर लिये और बाद में १४ के पहाड़े के आगे १५ का पहाड़ा और १५ के पहाड़े के आगे १४ का याद करा हुआ पहाड़ा लिखा ताकि मैं कोई न नकल ना करूँ । वैसे आप पहले जब भी पहाड़ा लिख कर देते थे और मैं याद करके लिखती थी तो मेरी नजर उधर चली जाती थी और मैं पहाड़ा याद होते हुए भी उसकी नकल करने लगती थी । इसीलिए मैंने अबकि बार १४ के पहाड़े के आगे १५ का पहाड़ा और १५ के पहाड़े के आगे १४ का पहाड़ा याद करके लिखा ताकि नकल ना करूँ ।
          
            मैं ये देखकर हतप्रभ रह गया कि १० वर्षीय एक छात्रा में कैसे ईमानदारी , कुछ नया करने की ललक और पढ़ाई के प्रति समर्पण था । मैंने उस लड़की को मन ही मन बहुत आशीर्वाद दिया और कहा कि बहुत बढ़िया ।
         
           अब तब से मैं ये युक्ति कई छात्रों पर प्रयोग कर चुका हूँ । इससे दो लाभ होते हैं । एक तो ये कि छात्र पहले पहाड़े याद करते हैं और फिर लिखते हैं जिससे एक प्रकार से वो स्वयं की ही तनावरहित परीक्षा ले लेते हैं और दूसरी ओर उन्हें पढ़ने की एक नयी युक्ति मिल जाती है । मेरे जो मित्र ग्रामीण परिवेश के छात्रों को पढ़ाते हैं , वो जानते हैं कि इन छात्रों को नये – नये तरीकों से पढ़ना कितना अच्छा लगता है । 

          अपनी छात्रा से सीखी गई इस युक्ति को मैं जीवन भर याद रखूँगा ।

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

शांति कबूतर की पीड़ा

         

                   शांति  कबूतर  की  पीड़ा

मित्रों ,
 आज मैं जब अपने घर की  छत पर गया तो मैंने देखा कि एक कबूतर छत की  पिछली दीवार पर बैठा हुआ था । शांत – सा , थका हुआ सा , एकदम सुस्त सा ।  मैंने उसे देखा तो सोचा  कि उससे पूँछू कि क्यों वो ऐसी दुर्दशा वाली स्थिति में है । अपने आपको एक तारणहार समझकर मैं उसके पास गया और बोला – “नमस्ते कबूतर जी ! कैसे हैं आप ?”
कबूतर ने फिर भी उदासी ही दिखाई । वैसे ही सुस्त – सा पड़ा रहा । मैंने पुन : अपना प्रश्न दोहराया । अबकि बार तीव्र स्वर में । तो वो कुछ खिसियाते हुए सा बोला – “ अबे ठलुए मास्टर ! तुझे अब कोई काम नहीं रह गया क्या ? वैसे तो तेरे रोज - रोज के नाटक रहते हैं कि मुझे समय नहीं मिलता ईंचार्ज हूँ , बी0एल0ओ0 भी हूँ । अब काहे मेरा आराम और अपना समय खोटी करता है वीड़ू ?”
कबूतर की महान वाणी सुनकर हम इस सोच में पड़ गये कि बताओ जी ! क्या हालत हो गयी है हम मास्टरों की अब कबूतर भी हमारा दर्द तो जानते हैं , पर साथ ही हड़काते भी हैं , जैसे कि हमारे अ............
खैर धीरे – धीरे हमने स्वयं को संभाला और पुन : अपने जिज्ञासु चरित्र पर उतर आये । हमने अपने  बी0 एड0 के प्रशिक्षण की कुछ युक्तियों का स्मरण किया तथा उन कबूतर जी पर दूसरे शब्दों में अपना प्रश्न उछाला । अबकि हमारे शब्दों के योग से बना वाक्य कुछ ऐसा था – “सफेद वाले कबूतर जी आप यहाँ कब तक बैठेंगे ?”
अब कबूतर जी और अधिक चिंतित परंतु सक्रिय अवस्था में आ गये । बोले – “तुम क्या ये चाहते हो कि मैं अभी चला जाऊँ ?
हम तुरंत ही बचाव की अवस्था में आ गये और तपाक से उत्तर दिया –“ नहीं बंधु अइसा नहीं है । हम तो सिर्फ इतना ही  जानना चाहते हैं कि आपकी आज ऐसी दशा क्यों है ये कृप्या हमसे साझा करें । “
(बातों – बातों में हम कबूतर जी को बंधु भी कह चुके थे । )
कबूतर जी अब कुछ मैत्रीवत व्यवहार की अवस्था में आ गये थे । वैसे भी अगर ना आते तो हमारी छत पर कैसे बैठे रह पाते ?  वे बोले – “ अरे क्या बताऊं यार ! अब तो लोगों ने जीना हराम कर रखा है । हमें किसी इंसान ने कभी किसी युग में शांति का प्रतीक घोषित किया था । युद्ध के बाद अगर दोनों पक्षों में संधि हो जाती थी तब भी हमें उड़ाया जाता है ।
 उस समय हमारी प्रजाति के लोग बड़े प्रसन्न हुए थे कि इतने सारे पक्षियों में हमें ही ये सम्मान मिला । पर आज हम लोग बहुत दु:खी हैं । पहले ऐसी घटना साल में १-२ बार ही होती थीं पर अब वैश्वीकरण का दौर है । सब लोग जान गये हैं कि युद्ध के बाद शांति कबूतर उड़ाना है । अब तो गली-मोहल्ले में भी छोटी - मोटी लड़ाई के बाद सफेद कबूतर उड़ाने लगे हैं । “
कबूतर जी बहुत ही गम्भीर मुद्रा में ये सब बखान कर रहे थे । पर हमने उन्हें बीच में टोक दिया – “ भैय्या तो इसमें तो अच्छी बात है । आपकी पूछ ही बढ़ रही है । इसमें परेशान होने की क्या बात है ?
कबूतर जी खिसियाते हुए बोले – “ पहले तो बीच में ही टोक रहे हो और फिर कह रहे हो कि परेशान क्यों हूँ मैं । अरे बताने तो दो ।“
कबूतर जी ने हमें घूरने की अवस्था में कहा । हम तो अब कुछ भी कहने की अवस्था में नहीं थे तो चुपचाप रहकर ही आँखों से ही कह दिया कि ठीक है । आप आगे कहें । परंतु वो चुप ही रहे और बोले ‌- “ अरे अब आगे की बात नहीं सुननी है क्या ?
ये सुनकर हम थोड़ा सा सकपकाये । हम बोले – “ अरे भाई हमने आँखों से हाँ कहा तो था । “
कबूतर जी ने ये सुनकर हमें आड़े हाथों लिया । बोले – “ अरे मास्टर साहब आपने फैशन में फोटोक्रोमिक शीशों वाली ऐनक लगा रखी है । किसी को आपके आँखें दिखाई ही कहाँ दे रही हैं ? हाँ नहीं तो । “
हमने फिर अपनी ऐनक उतारकर उन्हें आँखों से संकेत दिया कि आगे बोलें ।
वे बोले – “देखो भाई ऐसा है कि एक तो हर पक्षी की भाँति हमारी संख्या भी घट रही है पर युद्धों की संख्या बढ़ती जा रही है । अब इससे होता ये है कि हम लोग खुले आकाश में उड़ ही नहीं पा रहे हैं । लोग जैसे ही हमें देखते हैं तुरंत पकड़ने की कोशिश करने लगते हैं ताकि युद्ध के बाद या दो देशों की सीमा पर हमें उड़ा सकें । जानते हो हमें पकड़ने के बाद लोग खाने को कुछ भी नहीं देते ताकि हमें उनसे कोई प्रेम ना हो जाये और जैसे ही वो हमें उड़ाने की कोशिश करें । हम मिसाइल की गति से उड़ जायें । क्योंकि अगर ना उड़े तो उनका सार्वजनिक रूप से अपमान हो जायेगा ।
  जानते हो आजकल लोग युद्ध केवल मुँह से ही समाप्त करते हैं , हृदय से नहीं । सामने वाले के प्रति लोग दुर्भावना ही रखते हैं । इसीलिए जब हमें छोड़ना होता है और हमें छोड़ने वाले लोग हमें हाथ में पकड़ते हैं तो वह गुस्सा हम पर ही निकालते हैं । हमें इतनी निर्दयता से पकड़ते हैं जैसे कि अपने शत्रु की गर्दन पकड़े हों । क्रोध किसी और पर होता है और झेलना हमें पड़ता है । पर फिर भी हम शांति कबूतर बुरा नहीं मानते हैं । हमें बुरा तब लगता है जब हमें शांति के प्रतीक के रूप में उड़ाने वाले लोग अपने हर वादे को भूलकर फिर २-४ महीने में ही लड़ने लगते हैं । फिर जब वो लड़ते – लड़ते थक जाते हैं तो फिर हमें कहीं से पकड़कर ले आते हैं और फिर उड़ा देते हैं ।
सच कहूँ तो एक बात मेरी आज तक समझ में नहीं आई कि जब लोग हमें शांति का प्रतीक कहते हैं तो फिर हमें उड़ाकर क्या साबित करते हैं कहीं ये तो नहीं कि वे अपने मन से भी शांति को उड़ा रहे हैं । खैर फिर भी हम इसी आशा में रहते हैं कि कभी तो ऐसा दिन आयेगा कि लोगों को हमारी आवश्यकता ना पड़े । विश्व में चारों ओर शांति ही शांति हो । “
ये कहकर वो सफेद वाले कबूतर जी अपने पंखों को फड़फड़ाने लगे । हम ने तुरंत ही एक प्रश्न ठोंका – “ कहाँ जा रहे हो बंधु ?”
वो बोले – “ जा रहे हैं भाई फिर से उड़ने की कोशिश करेंगे भले ही कोई हमें फिर से पकड़ ले । आखिर हम हैं तो शांति के प्रतीक ही जैसे तुम मास्टर लोगों की छवि लोगों ने खराब कर रखी है । पर तुम अपना कर्त्तव्य नहीं छोड़ते हो । वैसा ही हम भी करते हैं भाई । आशा की किरण हरदम साथ रहती है – मास्साब जी “
ये कहकर कबूतर जी खुले आकाश में उड़ गये और हम उन्हें अपनी खुली आँखों से उड़ते हुए देख रहे थे । हम अपने को बड़ा महान मास्टर मानते थे-पूरे विश्व को सीख देने वाले पर आज कबूतर जी हमें सीख दे गए थे कि चाहें कितनी भी बुरी स्थिति क्यों ना हो जाये , कभी भी आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिये और हम उनकी दी गई इस अमूल्य शिक्षा पर उन्हें धन्यवाद भी देना भूल गए थे ।
आप लोगों को अगर वो कबूतर जी मिलें तो हमारी ओर से उन्हें धन्यवाद  अवश्य बोल दीजियेगा ।
  

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

जोरु का गुलाम

                                  बचपन में ही सिखा दिया 

 

फोटू देखा ?

कुछ स्मरण आया ।

ये हम सबके बचपन की प्रिय कहानी है मित्रों  "बंदर और मगरमच्छ"  की । अगर आपको स्मरण हो तो ये कहानी कुछ ऐसी थी कि मगरमच्छ घूमने का आदि था । सो एक दिन घूमते-घूमते वो पहुँच गया नदी के किनारे वहाँ उसकी मित्रता हो गयी एक बंदर से । जब मगरमच्छ ने बंदर से ले जाकर मीठे बेर अपनी पत्नी को खिलाये तो उसने कहा कि उसे अब बंदर का मीठा कलेजा खाना है । पहले तो मगरमच्छ  ने अपने आदर्शों का हवाला देकर कहा कि मैं ऐसा नहीं करूँगा।  पर बाद में मगरमच्छ की पत्नी ने हड़काया तो वो एक अच्छा ज़ोरु का गुलाम बनकर बंदर का कलेजा लेने निकल पड़ा ।

इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है - यही ना कि मगरमच्छ ज़ोरु का इतना बड़ा गुलाम था कि अपने मित्र की ही जान का दुश्मन बन गया ।  अब बच्चों को जब बचपन में ही ऐसी कहानी पढ़ा दी जायेगी तो बच्चे आगे चलकर क्या बनेंगे जी.......................................................................................................................................................................................
 सब के सब जोरु के गुलाम ना बन जायेंगे ? हाय रे ! बेचारे बच्चे ।

कहाँ गयी आरम्भ की सीढ़ियाँ

मित्रों,
मैं जिस दिन विद्यालय जाता हूँ , उस दिन बरेली से मिलक की यात्रा करता हूँ ।  मार्ग में एक स्थान पड‌ता है - फतेहगंज वहाँ का एक रूचिकर चित्र यहाँ चिपका रहा हूँ । आप लोग इस चित्र को देखेंगे तो पायेंगे कि इसमें सीढियाँ समाप्त तो हो रही हैं ,परंतु आरंभ..................
आप लोग इस चित्र को देखकर एक शीर्षक दीजिये ।

शीर्षक देते स्मरण रखियेगा कि शीर्षक कच्ची पोई वाला होना चाहिये (अर्थात् हँसोड़) ।