मंगलवार, 8 जनवरी 2013

क्या बलात्कारियों को सही सजा मिल पायेगी ?

              क्या बलात्कारियों को सही सजा मिल पायेगी ?


आखिरकार मौत से दो-दो हाथ करने वाली को मौत ने अपने आगोश में समेट ही लिया | ना जाने कौन सा वो दुष्ट प्राणी होगा जिसने पहली बार बलात्कार जैसा घ्रणित अपराध किया होगा | आखिर क्यों ये अपराध होता है ? चीखती हुई एक लड़की की आवाजें क्या ये जघन्य अपराध करने वालों के कानों को नहीं भेदती ? कैसे वे लोग किसी की दर्द भरी चीखों और छटपटाते बदन को अपना आनंद मान लेते हैं ? क्या कुछ इंसान बिना दिल के भी होते हैं ?

मेरा देश तो विवेकानंद का देश था जिन्होनें युवाओं से कहा था-" उठो,जागो और अपने अंदर निहित देवव्त्व को व्यक्त करो । " पर ये क्या यहाँ तो कुछ युवाओं ने शराब पीकर अपने अंदर के दानव को जगा दिया ।

उस लड़की के साथ दरिंदगी हुई और १३ दिन तक असहनीय पीड़ा सहकर उसकी आत्मा आज उसका शरीर छोड़ गयी । ये सब हुआ मात्र १३ दिन में और इस कुकृत्य को करने वालों को १३ महीने में भी सजा हो जाये तो बहुत है । क्योंकि अपराध होते हैं चीते की गति से और न्याय होता है चींटी की गति से ।

बलात्कार पर हमारा कानून उस युग का बना हुआ है जबकि ऐसे बलात्कार के मामले रोज़-रोज़ नहीं होते थे । अब तो ऐसे मामले बहुतायत से होते हैं । कई बलात्कारी तो बच के आसानी से निकल भी जाते हैं । आज की आधुनिक भाषा में कहें तो बलात्कारी तो अपडेट हो गए हैं पर हमारा कानून नहीं । टी0वी0 और इण्टरनेट अपनी शैशवावस्था में थे तब बना था ये कानून । अब तो खैर ये आवश्यकता से अधिक प्रचलित हो गये हैं । साथ ही इनमें अश्लील सामग्री का भण्डार भी है । सेंसर बोर्ड नाम की है तो एक चीज पर अधनंगे बदन और अश्लील संवाद वाले दृश्य फिर भी अव्यस्कों के लिए पास हो जाते हैं । आखिरकार बदन दिखाने पर और फूहड़ता परोसने पर अच्छी कमाई जो होती है । इनका किशोरों पर क्या प्रभाव पड़ता है , इस पर कितने लोग सोचते हैं ? इण्टरनेट की दुनिया में तो अश्लील सामग्री खैर बहुत ही आसानी से उपलब्ध है । इस पर कानून बना तो इन साईटों के खुलने से पहले एक चेतावनी आने लगी कि यदि आप १८+ ना हों तो इसे ना खोले । बस इनका उत्तरदायित्तव समाप्त , फिर चाहें ऐसी साईटों को १० साल का ही कोई बच्चा ना खोल ले । अरे क्लिक करने पर ये कहाँ पता चलता है कि क्लिक करने वाला कितने साल का है ? परिणाम ये होता है कि किशोर कब गलत रास्ते पर भटक जाते हैं , उन्हें स्वयं ही पता नहीं चलता ।

एक ओर ये जघन्य कांड हुआ और दूसरी ओर पूरे देश में बलात्कार की खबरें आती रहीं । यूँ तो ऐसी घटनायें रोज़ होती रहती हैं पर ये घटना मीडिया में कुछ ऐसी उछली कि सब ही की संवेदनायें जुड़ती चली गईं । कुछ विद्यालयों में इस पर वाद-विवाद प्रतियोगिता भी हुई । दिल्ली की देखा-देखी कई जगहों पर मोमबत्ती मार्च भी निकला । कुछ तो वास्तव में संवेदनशील थे बाकी ये सोच कर इनकी नकल कर रहे थे कि कहीं कोई हमें कम आधुनिक ना कह दे । मीडिया ने भी सोचा कि ये मुद्दा बिक रहा है तो उसने भी इस घटना को कई घंटे दिए । जो बिकता है वही तो चलता है ।

पर क्या आप लोग मानते हैं कि इस घटना से सूदूर गाँव में रह रहे युवाओं को कोई फर्क पड़ा ? सच तो ये है कि दूर-दराज में रहने वाले लोगों जहाँ आज भी विकास नहीं हुआ है वहाँ के लोगों को तो इस घटना का पता भी नहीं होगा क्योंकि वे लोग तो मेहनत-मजदूरी करके अपना पेट भरने में लगे हैं । इस घटना के बाद ऐसे लोग अपने बेटे-बेटियों को इस घटना से कोई सबक भी ना दे पाए होंगे । उन्हें इस घटना के बारे में बताएं तो भी कहते हैं- “अरे तो हम का करें हमन ने थोड़े ही कुछ करो है । “

चलिए अब आते हैं थोड़े विकसित क्षेत्र की ओर यहाँ कुछ थोड़े पढ़े-लिखे लोग जब ये घटना अखबारों में पढ़ते हैं तो कुछ ऐसी प्रतिक्रिया होती है-“ अरे दईय्या एक छोरी पर ऐते लोग पिल पड़े वा की तो हालते खराब हो गई होगी ।“

ये लोग कोई कैण्डिल मार्च नहीं निकालते ना ही किसी आंदोलन से जुड़ पाते हैं पर संवेदना अवश्य प्रकट कर देते हैं । अब आते हैं हम और आप । हम कैण्डिल मार्च भी निकालते हैं सोशल साईट पर भी लिखते हैं आन्दोलन में भी खड़े होते हैं । जानते हैं सोच में ये अंतर क्यों , वो इसलिए क्योंकि शिक्षा में बहुत अंतर है । आर्थिक स्तर में भी ।

हालाँकि कई लोग ऐसी खबरों में भी आनंद लेते हैं । पर मेरा मानना है कि कहीं ना कहीं अशिक्षित व्यक्ति ही ऐसे कुकृत्यों में अधिक संलिप्त रहते हैं । पढ़े-लिखे तो यौन शोषण करते हैं और आवाज को पैसों से दबा देते हैं , वे बलात्कार नहीं करते हैं । उच्च वर्ग के लोग जब ऐसा कोई कुकृत्य करते हैं तो रिपोर्ट ही नहीं लिखी जाती ।

सरकार वृद्धाश्रम बनाती है वृद्धों के लिए , महिलाओं और बच्चों के लिए भी कई योजनायें चलाती है । युवाओं के लिए भी कई योजनाएं चलाती है- जैसे बेरोजगारों के लिए ऋण, छात्रवृत्ति और अब तो ये भी कहा जा रहा है कि हर गाँव में एक खेल का मैदान होगा । चलिए बहुत अच्छी बात है । युवाओं को 2 चीजों की बहुत आवश्यकता होती है – नौकरी और छोकरी की । नौकरी की तो एक बार को आसानी से व्यवस्था हो जाती है – चाहे कोई अपने पैतृक व्यवसाय में लग जाता है या कहीं मजदूरी ढूंढ लेता है, ट्यूशन तो पढ़ा ही लेता है । किशोरावस्था से ही आर्थिक रूप से सबल होने का प्रयास करने लगता है । पर तस्वीर का दूसरा पहलू भी है । किशोर हार्मोंस का एक तूफान होता है । उसके शरीर में एकदम से ढेर सारे परिवर्तन हो रहे होते हैं , बस इसी के प्रबंधन की कोई व्यवस्था नहीं है । माँ – बाप इस संबंध में कोई शिक्षा दे नहीं पाते । इसकी अधकचरी शिक्षा मिलती है उन्हें अपने साथियों या फिर अपने से थोड़े बड़े किशोरों/युवाओं से । इसका परिणाम कुछ भी हो सकता है किशोर गलत कदम भी उठा सकते हैं क्योंकि हार्मोंस के तूफान का सही प्रबंधन नहीं हो पाया । क्या सरकार को इस संबंध में कुछ नहीं करना चाहिए ? ये सत्य है कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में सीधे-सीधे यौन शिक्षा संभव नहीं है पर सही आचरण की शिक्षा तो दी जा सकती है ना । कुछ ऐसे योगासन भी हैं जो कि ऐसी ही मनोवृत्ति को रोकने में सहायक हैं, उनकी तो शिक्षा दी जा सकती है ना । पर नहीं , देंगे तो सीधे यौन शिक्षा नहीं तो कुछ नहीं । हा....ह क्या अप्रयोगात्मक सोच है ।

शिक्षा और कानून एक साथ मिलकर क्या कर सकते हैं अगर जानना हो तो इतिहास उठाकर राजा राममोहन राय के बारे में पढ़िए ।

देखिए , आजकल नैतिक शिक्षा कितनी पिछड़ गई है ? एक उदाहरण देंखे - एक लिपिक की परीक्षा में प्रश्न होते हैं अंग्रेजी के, गणित के,अर्थशास्त्र के पर क्या उसकी नैतिकता या आचरण से कोई प्रश्न होता है ? नहीं ( अगर आने लगे ऐसे प्रश्न तो उसके लिए भी किताबें आ जायेंगी ) क्यों क्या एक लिपिक को केवल विभागीय ही ज्ञान होना चाहिए बाकी उसके आचरण से कोई मतलब नहीं ।


यह तो ठीक है कि हम सब क्रुद्ध हैं उन आरोपियों पर जिन्होनें ये कांड किया । पर वो कैसे इस परिस्थिति में पहुँचे क्या ये जानना जरूरी नहीं ? क्या सरकार और पुलिस का ये कर्त्तव्य नहीं बनता कि वो ऐसे अपराधियों से पूछे कि ऐसा जघन्य अपराध करने का विचार उन्हें कैसे आया ? वास्तव में उनसे इसकी पूछताझ करके क्या इसे सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए व इससे सीखकर ऐसी मनोवृत्ति को पनपने से रोकने का हर प्रयास क्या नहीं किया जाना चाहिए ?

आज नहीं तो कल इन लोगों को सजा तो मिल ही जायेगी पर उससे क्या होगा ? उन्हें सजा क्या मिलेगी संभवतया फाँसी । इससे क्या होगा , हमारा और आपका आक्रोश संभवतया शांत हो जाये । अगर 7 साल की कैद मिलती है तो क्या होगा ? ये अपराधी 7 सालों तक कारागार में रहेंगे , ये लोग पत्थर तोड़ेगे और नियमित रूप से खाना खायेंगे अपने से बड़े अपराधियों से मिलेंगे जो संभवतया इनसे ये भी कहें –“ अरे एक ही में अंदर आ गया , 2-4 तो कर लेता ।“

क्या दोनों ही परिस्थितियों में इन्हें अपराध बोध हुआ ? मुझे तो नहीं लगता । क्यों ना ऐसा किया जाए कि इन लोगों को सजा कि अवधि में प्रतिदिन एक घंटे ये लिखने को दिया जाए कि हम शर्मिंदा हैं । ये अपराध घ्रणित था आदि-आदि । जब तक रोज़ इन्हें ये एहसास नहीं कराया जाएगा । तब तक कैसे इसे सजा कह सकते हैं । अरे पत्थर तोड़ना, चक्की चलाना , बढ़ईगिरि , कपड़ा बनाना ये सारे काम तो एक मजदूर भी करता है । भले ही उसे 2 वक्त की रोटी नसीब ना हो पाए । पर कारागार में तो रोटी भी पक्की है । सजा तो वो है जब कि पल-पल एह्सास हो उन्हें अपने अपराध का । उस लड़की की दर्द भरी चीखें जब रोज़ सुनाईं जायें , हर पल उन्हें अपने कुकृत्य पर जब तक शर्म ना आने लगे तब तक सजा क्या खाक सजा है ?

सामूहिक बलात्कार की घटनायें यूँ तो रोज़ ही होती हैं, कई की तो रिपोर्ट भी नहीं लिखी जाती । पर ये घटना कुछ ऐसे सामने आयी कि हर शख्स इससे अपनेपन की भावना के साथ जुड़ता चला गया । आशा है कि इस घटना के बाद सरकार कानून में परिवर्तन लाए ना लाए पर समाज में परिवर्तन अवश्य आएगा ।
जानते हैं क्या ........................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................... कन्या भ्रूण हत्या संभवतया बढ़ जायें ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें